सोचता हू अब ,
देखता था तब......
वो दुनिया जिसमे आज से रंग कम थे,
अंधेरो और उजालोँ के अपने ढंग थे,
न कोई बनावट न थी कोई उलझन
सच तो ये है की तब दोस्त भी कम थे.....
उस दुनिया में नाजुक सा ख्वाब था बुना,
नंगे पैरो से उर्न्ने कि राह था चुना,
अल्हर जवानी करीब आ रही थी
जेब खाली थी पर जिंदगी मुस्कुरा रही थी....
असीम चाह थी अनंत सोच थी,
सागर में मोती की ख़ोज थी,
कहीं तराने कहीं चीख थी
हर पल में मिलती नयी सीख थी .......
तरप तब भी थी पर उलझन नही थी,
नींद ज्यादा थी पर इतनी सिलवट नहीं थी,
उस दुनिया के अपने अलग ही थे तेवर
रुकती थी लेकिन सरकती नहीं थी.........