बुधवार, 20 मार्च 2013

बुला रहे हैं गैर अब 
अपने भुला रहे हैं 
जगा रहीं है नींदे 
सपने सुला रहे हैं 

उजालों का हांल ये है 
कि भूल गया चेहरा 
अँधेरे ने भेज दिए हैं जुगनू 
सन्नाटे बुला रहे हैं 

कह रहा है वक़्त कि 
बस पीछे मुड़ कर देख लो 
जितनी भी ख्वाहिशें थीं 
दिल में आज समेट  लो 

बस यहीं से चल पड़ो 
दूर कहीं उड़ चलो 
रास्तों की फ़िक्र छोडो 
उस घाट तक पहुँच चलो 

उम्मीद वाले घर में 
सपनों के उस नगर में 
कोई रस्ता देख रहा है 
चेहरा लिये नयन में 

अंतस का अम्बर छूना 
जी भर के सांस लेना 
दामन में सर को रख के 
दुनिया समेट लेना

बस  ! हर एक कदम में अपने 
अब जी भर के जान रखना 
देखो !  देख रहा है कोई 
उसको उदास मत करना 








रविवार, 10 मार्च 2013

बचपन में 
हर रोज सुबह सूरज मिलने आता था 
मिजाज मौसम का बताकर 
फूल कलियों को खिलाकर 
शाम तक की ख़ुशी देकर
दूर चला जाता था .

हर शाम को 
घर के उत्तर 
नहर के किनारे 
उस ग्राउंड की घासें 
खींच लेती थी किसी बड़े चुम्बक की तरह 
खेलते खेलते 
थक के चूर होकर 
घर पहुँचने से पहले ही 
नींदें बिस्तर तक पहुँच जाती थीं 
और 
पूरब वाली खिड़की से 
चांदनी झाँका करती थी .

जरूरी दवाएं खाकर 
बिस्तर पर तारे गिनते हुए सोच रहा हूँ 
सोच रहा हूँ कि 
उगता सूरज कब देखा था ?
कब दौड़ा था उत्तर की तरफ 
और 
किसी हंसती  शाम  को 
घास के मखमली सेज पर 
कब चूमा था मेरे बल्ले ने 
किसी बल खाती  गेंद को… 

मुझे पता है 
ये शहर एडवांस है 
यहाँ सुबह नहीं होती 
खुशियाँ बोतलों में खरीदी जाती हैं 
और
जब तक जिंदगी है
जवान ही रहती है.