भारत सरकार की वेबसाइटों पर हिंदी की उपस्थिति : उपयोगिता , चुनौतियाँ और भविष्य
भारत एक लोकतान्त्रिक देश है। हिंदी बोलने और समझने वालों की संख्या अन्य किसी भी भारतीय भाषा से ज्यादा है। आज का युग सूचना का युग है। तकनीक का युग है। किसी इंसान का वेबसाइट से संपर्क एक भाषा के माध्यम से होता है। जितना भी समय वेबसाइट पर बिताते है, लगातार इसी भाषा के माध्यम से जीवंत रहते हैं। ये भाषा हिंदी , इंग्लिश , मंदारिन कुछ भी हो सकती है। इंटरनेट के लिए हर भाषा सामान है। भारत सरकार की भी इंटरनेट पर उपस्थिति सरकारी वेबसाइट के माध्यम से होती है। www.india.gov.in भारत सरकार का सरकारी पोर्टल है , जहां हर विभाग और महत्वपूर्ण वेबस्इटों का लिंक है।
इससे पहले की मैं हिंदी की बात करूँ , दो बातें विशेष रूप से रेखांकित करना करना चाहूंगा :
1. हिंदी भाषा और इंटरनेट : बोलने वालों की संख्या के हिसाब से हिंदी विश्व में चौथी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है। भारत में इंटरनेट का प्रयोग करने वाले लोगों की संख्या 200780998 है जो विश्व में तीसरे नंबर पर है और इंटरनेट पर हिंदी भाषा का हिस्सा 0 . 1 % से भी कम है। [source : wikipedia ]
2. हिंदी भाषा और भारत का संविधान : भारत सरकार की कार्यप्रणाली एक लिखित संविधान के अनुसार चलती है। संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार "हिंदी" भारत की राजभाषा है। अनुच्छेद 351 के अनुसार " संघ का कर्तव्य होगा कि वह हिंदी भाषा का प्रसार बढ़ाए , उसका विकास करे जिससे वह सामासिक संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके ………................ और जहां आवश्यक और वांछनीय हो वहां उसके शब्द - भण्डार के लिए मुख्यत: संस्कृत से और गौणत: अन्य भाषाओं से शब्द ग्रहण करते हुए उनकी समृद्धि सुनिश्चित करे।"
भारत सरकार की लगभग सभी सरकारी वेबस्इटों पर हिंदी संस्करण का लिंक उपलब्ध है। उपस्थिति है। जब इस लिंक को खोलने की बात आती है तो समस्याएं शुरू होने लगाती हैं। कुछ मुख्य समस्याएं निम्न हैं :
> सभी पृष्ठों का हिंदी संस्करण उपलब्ध नही है।
> हिंदी अनुवाद समझने में काफी दिक्कत है।
> कुछ शब्द अंग्रेजी से इस तरह रखे गए हैं कि न तो हिंदी में कुछ अर्थ निकलता है न ही न ही अंग्रेजी में।
कुछ उदाहरण :
1. गृह मंत्रालय के वेबसाइट का एक पृष्ठ :
2. योजना आयोग सहित कई महत्वपूर्ण संस्थानों की वेबसाइट का हिंदी संस्करण ही नही है।
अब मैं हिंदी संस्करण की उपयोगिता और सार्थकता का मूल्यांकन करने की कोशिश करता हूँ तो कई तरह की बातें मन में आतीं हैं। एक लोकतान्त्रिक सरकार , जिसका उद्देश्य वेबसाइटों के माध्यम से कतार के आखिरी छोर तक पहुँचने का है , इस तरह का भाषायी पक्षपात क्यों है ? क्या तकनीक में कोई कमी है ? क्या मानव संसाधन की उपलब्धता नहीं है ? क्या मानव संसाधन और तकनीक का समन्वय नही है ? क्या हिंदी भाषा की क्षमता नही है ? शब्द - कोश में कोई त्रुटि है ? प्रशासनिक कठिनाई है ? क्या ये मान लिया गया है कि इस तरह कि हिंदी से सरकार का उद्देश्य पूरा हो जायेगा ? ऐसे में यह संवैधानिक आदर्शों का उलंघन नहीं हैं ? सबसे महत्वपूर्ण बात की जिम्मेदारी किसकी है ?
जब चुनौतियों की पड़ताल करना चाहता हूँ, तो आश्चर्य होता है कि उदासीनता इस हद तक है कि हमने उम्मीद ही छोड़ दी है। हिंदी मेरी मातृभाषा है। अंग्रेजी स्कूल में सीखना शुरु किया और आज तक सीख ही रहा हूँ । इंटरनेट पर काम करते समय मैं अक्सर सोचता हूँ कि यदि ये काम हिंदी में होता तो क्या मैं अधिक सहज होता ? क्या मेरी उत्पादकता अधिक होती ? क्या मैं नई चीजों को जल्दी सीख सकता ? फिर मुझे ख्याल आता है उस २० करोड़ स्कूल जाने वाले बच्चों का , जिनकी मातृभाषा हिंदी है। क्या उनके लिए इंटरनेट सीखना उतना ही आसान है जितना इंग्लिश देश के बच्चों के लिए है ? बैंकिंग , आवेदन , निविदाएं , परिणाम आदि कागज से मुक्त होकर इंटरनेट पर आ चुके हैं। आम आदमी के लिए भी इंटरनेट सीखना जरूरी होता जा रहा है। ऐसे में क्या इंटरनेट पर हिंदी में काम सीखा और किया जा सकता है ? क्या ये वही हिंदी है जो हमारी मातृभाषा है ?
आखिर में बात संभावनाओं की। पहली बात ये कि क्या जो हिंदी हम बोलते है , वह वेबसाइट पर आ सकती है नहीं ? व्यवहारिक हिंदी को वेबसाइट पर उपलब्ध कराने में जरूरत किस बात की है ? दूसरी बात ये है की यदि आम बोल चाल वाली हिंदी वेबसाइट पर आ गयी तो फायदा कितना होगा ? कार्य क्षमता से लेकर रूचि बढ़ाने तक में व्यवहारिक हिंदी का कितना योगदान हो सकता है।
मैंने यह विषय अपनी रूचि के आधार पर तय किया है। भाषा की कुछ सामाजिक जिम्मेदारियाँ बनती हैं। ऐसे में मुझे पूरी उम्मीद है कि इस क्षेत्र में काम करके मुझे न सिर्फ व्यक्तिगत
संतुष्टि मिलेगी बल्कि हिंदी भाषा की व्यवहारिक उपयोगिता को और करीब से देखने और समझने का सुअवसर भी प्राप्त होगा।
विनीत कुमार यादव
सन्दर्भ स्रोत
एम. ए.
प्राचीन काव्य
मध्ययुगीन काव्य
हिंदी साहित्य का इतिहास (रीतकाल तक )
हिंदी साहित्य का इतिहास ( आधुनिक काल )
भारतीय काव्य शास्त्र
पाश्चात्य काव्य शास्त्र
नाटक एवं अन्य गद्य विधाएँ
हिंदी कथा साहित्य
विशेष कवि/लेखक - कबीर
पत्रकारिता एवं संपादन कला
प्रयोजन मूलक हिंदी
हिंदी भाषा का विकास
आधुनिक काव्य : छायावाद तक
छायावादोत्तर काव्य
भाषा विज्ञानं
संक्षिप्त चर्चा
हिंदी मेरी मातृभाषा है। बारहवीं तक की पढ़ाई मैंने हिंदी माध्यम में की है। एम. ए. के तीसरे सेमेस्टर में वैकल्पिक विषय के रूप में मैंने हिंदी पत्रकारिता का अध्यन किया है। तकनीक के विकास के साथ पत्रकारिता के रूप में परिवर्तन होता गया। समाचार पत्र , रेडियो , टेलीविजन , इंटरनेट और अब सोशल मीडिया से लेकर माइक्रो ब्लॉगिंग तक का सफर पत्रकारिता ने तय किया है।
हिंदी समाचार पत्र और पत्रिकाओं का पालन पोषण हिंदी साहित्यकारों की गोद में हुआ है। शुरूआती समय में दोनों एक दुसरे के पूरक रहे हैं। लेकिन जब टेलीविजन के आगे का समय देखता हैं हूँ तो साहित्यकार गायब हो चुका होता है या नाम मात्र का होता है। मुझे सामंजस्य की कमी साफ दिखती है। कभी बाजारवाद के साथ , कभी तकनीक के साथ और कभी जरूरी बदलाव न ला पाने के कारण। हिंदी धीरे -धीरे पिछड़ती चली गयी। आधुनिक समाज और तकनीक के साथ सामंजस्य ना बना पाने के कारण आज दयनीय स्थिति में है। इंटरनेट के युग में हिंदी भाषी समाज कहीं न कहीं भाषायी दबाव में है। भाषा कुछ की सामाजिक जिम्मेदारी होती है। ऐसे में एक लोकतान्त्रिक देश की वेबस्इटों पर राजभाषा की उपस्थिति और उपयोगिता की पड़ताल करना चाहता हूँ। आखिर कैसे इस तकनीक का लाभ ,हिंदी भाषी लोग अधिक से अधिक उठा सकें- यही इस अध्ययन का लक्ष्य है।
कंप्यूटर अभियांत्रिकी में स्नातक और हिंदी साहित्य में परास्नातक होने के नाते मुझे उम्मीद है कि मैं इन दोनों के लिंक को बारीकी से परख सकता हूँ
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय जैसे संस्थान से जुड़ना मेरे लिए गर्व की बात होगी। भविष्य के बारे में मेरी यही योजना है कि मैं बुद्धजीवी वर्ग का सदस्य बनना चाहता हूँ । मैं विचारों की दुनिया का नागरिक बनना चाहता हूँ।
विनीत कुमार यादव