बुधवार, 11 सितंबर 2013

कश्ती को यूँ रोक के, समंदर को  मत गुमराह कर
या तो समेट लो खुद को या उस पार तक विस्तार कर

खौफ़ हो , तन्हाई  हो , सितम हो या  लाचारी 
सब बिना सरहद के है , तू बस नक्शा तैयार कर

रविवार, 21 जुलाई 2013

 यूँ तो दो-चार  दिन के लिए ही , अच्छे होते हैं यहाँ लोग
कुछ और हैं जो, जिंदगी भर ले लिए ""बहुत अच्छे " हो जाते हैं 

शुक्रवार, 19 जुलाई 2013

भीगे हुए पत्तों से
टपकती बूंदों को देखकर
नजरें थम सी गयीं

कुछ ख़ास नहीं
बस यूँ ही
ऐसा लगा  कि
न तो 
दिल में
वो नमीं रही
न ही
अश्रु जलों
में वो खारापन

जिस्म की चादर में
उलझी हुयी रूह
अक्सर खोजती है
उस खारेपन को
उस नमीं को
हाँ
ये और बात है कि 
ख्यालों के ख़त 
आज भी
आते जाते रहते हैं
फर्क बस इतना है कि
मैं
होकर भी नहीं होता  हूँ
और
तुम अभी भी
हर तरफ ...........




अब तो शाखों से भी वही आवाज आती है
गिरते पत्तों ने तड़पकर जो आह भरी थी 

गुरुवार, 18 जुलाई 2013

उगते सूरज की लाली बिन
ढलती शाम की प्याली बिन
ये दिन किसके हिस्से के हैं
चढ़ती उम्र के बेजुबानी दिन

कब सुबह हुयी
कब शाम हुयी
कुछ पता नहीं
कब रत गयी


मंगलवार, 25 जून 2013

तुम्हारी क्यूँ न तकूँ  मैं राह

बांह छांह

छाये रे भ्हाये रे ललचाये रे




आते -जाते , मिलते- बिछुरते , तू है मुझको भाये रे
सीधा सादा सरल सलोना , तू रोज संवरता जाये रे



प्यारी प्यारी पलकें तेरी  ,जिनकी शीतल छांव

तुम्हारी क्यूँ न तकूँ  मैं राह
http://www.youtube.com/watch?v=qnE7N6prtdM
  ये  कसक है -- तन्हाई  और सूनेपन के बीच की  .... इसे बस इतना पता है कि कुछ हो रहा है ..पता नहीं कहाँ ... क्या ..... अच्छा या बुरा .... कुछ  पता नहीं ...घर का आँगन, कालेज की कैंटीन , ऑफिस की पार्किंग .. बिल्डिंग का पार्क .. कहीं से कोई सुराग नही .
बस यही महसूस हो रहा है कि इस समय "कहीं और" होना चाहिए था .

मंगलवार, 18 जून 2013



बूंदों की शरारत से 
पत्ते अपनी
करवटें 
बदलते रहे
और 
पत्तों से 
लटकती बूंदें 
गिरने से पहले 
चूम लेना चाहती थी 
पत्ते को
चारो ओर से ...









रविवार, 9 जून 2013

जब कभी
ख्वाहिशों की लहरें 
यादों में मचलती हुइ 
तन्हाई से टकराती है
तो 
इरादों की  रेत पर
बिखर  जातीं  हैं 

रेत की 
इसी नमीं से 
अब तक 
वो सपना जिंदा है 
जिसे 
तुमने अपने अधरों से 
सींचा था कभी 








शनिवार, 25 मई 2013

प्यार में जिन्दगी सिमट जाती है . बेहतर है की पहले जिन्दगी को इतना विस्तार दे दो की सिमटने के बाद भी खुद की उम्र तो  बची रहे --- अज्ञात 

मंगलवार, 21 मई 2013

 हवा कायनाती कलि


रात
ये सुनने के लिए
खामोश है
कि
दिन के शोर में
जो बातें मन में ही
दब गयीं थीं
उन्हें शब्द मिल सके

अँधेरे की चादर फैला के
रूह की
हर काश-म-कश
को
समेटना चाहती है

उसे पता है
पूरा दिन
जो उजाले के साथ बीता है
उसमे
दुनिया रंग बिरंगी थी
जिसमे
मुस्कान का दर्द
और
न रोने  की बेबसी
भी
थी





गुरुवार, 16 मई 2013





तुम्हारे रूह की आहट का अजब सा  श्रिंगार होता है

सिमट के ख्वाब आँखों में , न जगता है न सोता है

वक़्त की दरिया में सब बह जाता है ,लोग कहते  हैं

पर जो पहले कभी कभी होता था ,अब बार बार होता है













सुलगती शाम को जब भी धुएँ पे गुबार होता है

रात के नसीब में अब भी इन्तजार होता है

किसी के रूह की आहट से , अक्सर दिल दो चार होता है


सोमवार, 22 अप्रैल 2013

आज सुबह जब नींद खुली तो कमरे का सन्नाटा कुछ कह रहा था . ये सन्नाटा बेवजह नही चिल्ला रहा था .  मेरे साथ रहने वाला सौम्य दिल्ली छोड़कर इलाहाबाद जा चुका था . जहन तक मई उसे समझ पाया, वो इंजीनियरिंग कभी नहीं करना चाहता था . मगर जिन्दगीं न सिर्फ  B.tech. करवा चुकी थी बल्कि M.tech. भी करवा रही थी . मगर  एक आग थी उसके अन्दर . मेरा यकीन है की ये आग उसे ऐसे मुकाम पे पहुंचाएगी जहाँ वो जाना चाहता है.  सृजन का प्रेमी है . और हाँ , वो गलियां बहुत  देता है .... सिर्फ इसलिए की वो कभी रोता नहीं . कुछ दिन पहले एक छोटी सी बिल्ली के प्रति उसका जो प्रकृति-प्रेम देखा , उससे तो यही लग रहा था की आज की दुनिया में उस जैसे लोगों की बहुत जरुरत है. एक आदर्श मित्र और रूम-मेट  की तरह वो मेरे यादों की दुनिया में हमेशा आबाद रहेगा . आखिर में उसके लिए यही कहूँगा कि  ....


ख़ुदा के हुक्म से शैतान भी है आदम भी
वो अपना काम करेगा तुम अपना काम करो .

शेष जीवन की अशेष शुभकामनायें .
मई मैं 

गुरुवार, 18 अप्रैल 2013

आज सुबह से
दिल कह रहा है
फिर पास बैठूं
सांसों के शोर में
झूठे बहाने सुनूँ
और
मुस्कुराते हुए
ये सोचूं
कि
तुम इतनी अच्छी क्यों लगती हो

वक़्त की शिफारिश पे
एक नई राह संवारी है
बहुत  अलग है ये दुनिया  फिर भी
तलाश तेरी, अब भी जारी है 
जब तक है खौफ़ मरने का ,

जिंदा नहीं हो तुम    

सोमवार, 8 अप्रैल 2013

गुजरे हैं  " इसी "  मुकाम से

गिरते परते कई  बुजुर्ग

हम लोग भी अब
परेशान
उसी सिलसिले में हैं 

गुरुवार, 4 अप्रैल 2013

वक़्त के साथ हसरतों ने करवट बदली है ... और इस  हादसे में एक मासूम बच्चा बच तो गया पर शायद जिंदा नही है अब ... 
रतजगे की आदत ने उससे सुबह की उम्मीद के बदले ,  घड़ी को घूरना सिख दिया है 
शाम की खिलखिलाहट अब टीवी और लैपटॉप के स्क्रीन में तलाशी जा रही है .... लेकिन ये सब ज्यादा दिन नही चलेगा .... 
इससे पहले की सपनों की लालच देकर नींद अपने आगोश में ले, बच्चे को फिर खिलौनों के लिए जिद करना होगा ... फिर से ए ...बी ...सी ... डी  सीखनी होगी  
अरे ये क्या ! बच्चा तो उठ के बैठ गया 
इस उम्मीद में की अगली सुबह फिर से उम्मीदें लेकर आएगी ......शुभ रात्रि 

बुधवार, 20 मार्च 2013

बुला रहे हैं गैर अब 
अपने भुला रहे हैं 
जगा रहीं है नींदे 
सपने सुला रहे हैं 

उजालों का हांल ये है 
कि भूल गया चेहरा 
अँधेरे ने भेज दिए हैं जुगनू 
सन्नाटे बुला रहे हैं 

कह रहा है वक़्त कि 
बस पीछे मुड़ कर देख लो 
जितनी भी ख्वाहिशें थीं 
दिल में आज समेट  लो 

बस यहीं से चल पड़ो 
दूर कहीं उड़ चलो 
रास्तों की फ़िक्र छोडो 
उस घाट तक पहुँच चलो 

उम्मीद वाले घर में 
सपनों के उस नगर में 
कोई रस्ता देख रहा है 
चेहरा लिये नयन में 

अंतस का अम्बर छूना 
जी भर के सांस लेना 
दामन में सर को रख के 
दुनिया समेट लेना

बस  ! हर एक कदम में अपने 
अब जी भर के जान रखना 
देखो !  देख रहा है कोई 
उसको उदास मत करना 








रविवार, 10 मार्च 2013

बचपन में 
हर रोज सुबह सूरज मिलने आता था 
मिजाज मौसम का बताकर 
फूल कलियों को खिलाकर 
शाम तक की ख़ुशी देकर
दूर चला जाता था .

हर शाम को 
घर के उत्तर 
नहर के किनारे 
उस ग्राउंड की घासें 
खींच लेती थी किसी बड़े चुम्बक की तरह 
खेलते खेलते 
थक के चूर होकर 
घर पहुँचने से पहले ही 
नींदें बिस्तर तक पहुँच जाती थीं 
और 
पूरब वाली खिड़की से 
चांदनी झाँका करती थी .

जरूरी दवाएं खाकर 
बिस्तर पर तारे गिनते हुए सोच रहा हूँ 
सोच रहा हूँ कि 
उगता सूरज कब देखा था ?
कब दौड़ा था उत्तर की तरफ 
और 
किसी हंसती  शाम  को 
घास के मखमली सेज पर 
कब चूमा था मेरे बल्ले ने 
किसी बल खाती  गेंद को… 

मुझे पता है 
ये शहर एडवांस है 
यहाँ सुबह नहीं होती 
खुशियाँ बोतलों में खरीदी जाती हैं 
और
जब तक जिंदगी है
जवान ही रहती है.  

मंगलवार, 29 जनवरी 2013

महात्मा गाँधी के दर्शन का आधार " सत्य  पर  विश्वास " था। चंपारण से लेकर राजघाट तक के भारतीय  राजनीतिक जीवन में ऐसे कई मौके आये जब बापू  को जानबूझकर चुप रहना पड़ा। अपमानित भी होना पड़ा। चाहे सुभाष चन्द्र बोस हों या  जिन्ना, बापू ने कभी भी गलत को सही नही कहा।
उसी विश्वास को आज विश्व नमन कर रहा है।
कोटि कोटि नमन !!!

मंगलवार, 1 जनवरी 2013


वक़्त का आखिर तारीखों से रिश्ता क्या है
सदियों पहले
जब इंसान ने वक्त को कैद करना चाहा  होगा
तो उसने तारीखें बनायीं होंगी
ये देखकर
वक़्त मुस्कुराया होगा
उसने  देखा कि अब इंसान उसका हिसाब रखना शुरू करेगा
लेकिन वक्त तो वक्त ठहरा
उसे तो  आवारगी की आदत पड़ चुकी थी
ये सोचकर कि इंसान को 
शायद कभी अक्ल आ जाय
वक्त आज भी अपने अंदाज में
शायरों के ख्याल सा
हर रोज दुनिया के हजारों चक्कर लगाता रहता है
और इंसान तारीखों में ही
खोकर खुश है .............विनीत












तेरे बन्दों ने भी क्या क्या किया है  तमाशा मौला
अंकों का हेर फेर और फासला है  सदियों का -


वक़्त से बड़ा आवारा कोई और कहाँ


हर घड़ी का हिसाब रखना पड़ता है आज कल
वक़्त का आखिर तारीखों से रिश्ता क्या है










समंदर की है आरजू

रास्ता है नदियों का