रविवार, 21 जुलाई 2013

 यूँ तो दो-चार  दिन के लिए ही , अच्छे होते हैं यहाँ लोग
कुछ और हैं जो, जिंदगी भर ले लिए ""बहुत अच्छे " हो जाते हैं 

शुक्रवार, 19 जुलाई 2013

भीगे हुए पत्तों से
टपकती बूंदों को देखकर
नजरें थम सी गयीं

कुछ ख़ास नहीं
बस यूँ ही
ऐसा लगा  कि
न तो 
दिल में
वो नमीं रही
न ही
अश्रु जलों
में वो खारापन

जिस्म की चादर में
उलझी हुयी रूह
अक्सर खोजती है
उस खारेपन को
उस नमीं को
हाँ
ये और बात है कि 
ख्यालों के ख़त 
आज भी
आते जाते रहते हैं
फर्क बस इतना है कि
मैं
होकर भी नहीं होता  हूँ
और
तुम अभी भी
हर तरफ ...........




अब तो शाखों से भी वही आवाज आती है
गिरते पत्तों ने तड़पकर जो आह भरी थी 

गुरुवार, 18 जुलाई 2013

उगते सूरज की लाली बिन
ढलती शाम की प्याली बिन
ये दिन किसके हिस्से के हैं
चढ़ती उम्र के बेजुबानी दिन

कब सुबह हुयी
कब शाम हुयी
कुछ पता नहीं
कब रत गयी