मंगलवार, 25 जून 2013

तुम्हारी क्यूँ न तकूँ  मैं राह

बांह छांह

छाये रे भ्हाये रे ललचाये रे




आते -जाते , मिलते- बिछुरते , तू है मुझको भाये रे
सीधा सादा सरल सलोना , तू रोज संवरता जाये रे



प्यारी प्यारी पलकें तेरी  ,जिनकी शीतल छांव

तुम्हारी क्यूँ न तकूँ  मैं राह
http://www.youtube.com/watch?v=qnE7N6prtdM
  ये  कसक है -- तन्हाई  और सूनेपन के बीच की  .... इसे बस इतना पता है कि कुछ हो रहा है ..पता नहीं कहाँ ... क्या ..... अच्छा या बुरा .... कुछ  पता नहीं ...घर का आँगन, कालेज की कैंटीन , ऑफिस की पार्किंग .. बिल्डिंग का पार्क .. कहीं से कोई सुराग नही .
बस यही महसूस हो रहा है कि इस समय "कहीं और" होना चाहिए था .

मंगलवार, 18 जून 2013



बूंदों की शरारत से 
पत्ते अपनी
करवटें 
बदलते रहे
और 
पत्तों से 
लटकती बूंदें 
गिरने से पहले 
चूम लेना चाहती थी 
पत्ते को
चारो ओर से ...









रविवार, 9 जून 2013

जब कभी
ख्वाहिशों की लहरें 
यादों में मचलती हुइ 
तन्हाई से टकराती है
तो 
इरादों की  रेत पर
बिखर  जातीं  हैं 

रेत की 
इसी नमीं से 
अब तक 
वो सपना जिंदा है 
जिसे 
तुमने अपने अधरों से 
सींचा था कभी