कोई अपने घर में है, कोई जाग रहा है रातों में...
चुप सा घर की बातें सुनता, कोई चीख रहा सन्नाटों में..
उसकी बोली सुनने की
आदत जब चिल्लाती है..
कहीं रूठ न जाये वो
मोबाईल हाथों से गिर जाती है..
उसकी करवट, उसकी नीदें
उसके सपने बाहों में...
कोई चुप सा घर में है
कोई चीख रहा सन्नाटों में....
जिसकी बस एक आहट से
दिल में लहरें तूफानी हों..
रेत,समंदर, पुरवाई हो
धड़कन जिसकी दीवानी हो ..
हो बसंती मन का मौसम , दीप जले जज्बातों में,
कोई अपने घर में है, कोई जाग रहा है रातों में....... "विनीत"
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