वक़्त का आखिर तारीखों से रिश्ता क्या है
सदियों पहले
जब इंसान ने वक्त को कैद करना चाहा होगा
तो उसने तारीखें बनायीं होंगी
ये देखकर
वक़्त मुस्कुराया होगा
उसने देखा कि अब इंसान उसका हिसाब रखना शुरू करेगा
लेकिन वक्त तो वक्त ठहरा
उसे तो आवारगी की आदत पड़ चुकी थी
ये सोचकर कि इंसान को
शायद कभी अक्ल आ जाय
वक्त आज भी अपने अंदाज में
शायरों के ख्याल सा
हर रोज दुनिया के हजारों चक्कर लगाता रहता है
और इंसान तारीखों में ही
खोकर खुश है .............विनीत
तेरे बन्दों ने भी क्या क्या किया है तमाशा मौला
अंकों का हेर फेर और फासला है सदियों का -
वक़्त से बड़ा आवारा कोई और कहाँ
हर घड़ी का हिसाब रखना पड़ता है आज कल
वक़्त का आखिर तारीखों से रिश्ता क्या है
समंदर की है आरजू
रास्ता है नदियों का
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