रविवार, 10 मार्च 2013

बचपन में 
हर रोज सुबह सूरज मिलने आता था 
मिजाज मौसम का बताकर 
फूल कलियों को खिलाकर 
शाम तक की ख़ुशी देकर
दूर चला जाता था .

हर शाम को 
घर के उत्तर 
नहर के किनारे 
उस ग्राउंड की घासें 
खींच लेती थी किसी बड़े चुम्बक की तरह 
खेलते खेलते 
थक के चूर होकर 
घर पहुँचने से पहले ही 
नींदें बिस्तर तक पहुँच जाती थीं 
और 
पूरब वाली खिड़की से 
चांदनी झाँका करती थी .

जरूरी दवाएं खाकर 
बिस्तर पर तारे गिनते हुए सोच रहा हूँ 
सोच रहा हूँ कि 
उगता सूरज कब देखा था ?
कब दौड़ा था उत्तर की तरफ 
और 
किसी हंसती  शाम  को 
घास के मखमली सेज पर 
कब चूमा था मेरे बल्ले ने 
किसी बल खाती  गेंद को… 

मुझे पता है 
ये शहर एडवांस है 
यहाँ सुबह नहीं होती 
खुशियाँ बोतलों में खरीदी जाती हैं 
और
जब तक जिंदगी है
जवान ही रहती है.  

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