बचपन में
हर रोज सुबह सूरज मिलने आता था
मिजाज मौसम का बताकर
फूल कलियों को खिलाकर
शाम तक की ख़ुशी देकर
दूर चला जाता था .
हर शाम को
घर के उत्तर
नहर के किनारे
उस ग्राउंड की घासें
खींच लेती थी किसी बड़े चुम्बक की तरह
खेलते खेलते
थक के चूर होकर
घर पहुँचने से पहले ही
नींदें बिस्तर तक पहुँच जाती थीं
और
पूरब वाली खिड़की से
चांदनी झाँका करती थी .
जरूरी दवाएं खाकर
बिस्तर पर तारे गिनते हुए सोच रहा हूँ
सोच रहा हूँ कि
उगता सूरज कब देखा था ?
कब दौड़ा था उत्तर की तरफ
और
किसी हंसती शाम को
घास के मखमली सेज पर
कब चूमा था मेरे बल्ले ने
किसी बल खाती गेंद को…
मुझे पता है
ये शहर एडवांस है
यहाँ सुबह नहीं होती
खुशियाँ बोतलों में खरीदी जाती हैं
और
जब तक जिंदगी है
जवान ही रहती है.
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