अँधेरे हों - उजाले हों , है चिरंतन आबरू इनकी
महज थोड़ी सी मिट्टी की , सहज है दास्ताँ अपनी
सफर है चंद ख्वाबों का, कुछ तो ढंग का काम करूँ
है तेरा मौसम -तेरी जय जय , क्यूँ तुझको याद करूँ
…… विनीत (दीपावली ,2014 )
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