गुरुवार, 4 अप्रैल 2013

वक़्त के साथ हसरतों ने करवट बदली है ... और इस  हादसे में एक मासूम बच्चा बच तो गया पर शायद जिंदा नही है अब ... 
रतजगे की आदत ने उससे सुबह की उम्मीद के बदले ,  घड़ी को घूरना सिख दिया है 
शाम की खिलखिलाहट अब टीवी और लैपटॉप के स्क्रीन में तलाशी जा रही है .... लेकिन ये सब ज्यादा दिन नही चलेगा .... 
इससे पहले की सपनों की लालच देकर नींद अपने आगोश में ले, बच्चे को फिर खिलौनों के लिए जिद करना होगा ... फिर से ए ...बी ...सी ... डी  सीखनी होगी  
अरे ये क्या ! बच्चा तो उठ के बैठ गया 
इस उम्मीद में की अगली सुबह फिर से उम्मीदें लेकर आएगी ......शुभ रात्रि 

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